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सूफी मत का भेद
बाबा एहसानुल्लाह खान वारसी
 

एक सर्वश्रेशठ महान गुरू हैं. ऐसे महान गुरुओं के लिए अल्लाह ने कुरान में कहा:

أَلَا إِنَّ أَوْلِيَاءَ اللَّهِ لَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
अला इन्ना औलिया अल्लाहू ला खौफ़ुन अलैहिम वला हुम या ज़नून
(सूरा यूनुस - वॉल्यूम / बाल 11 - आयत 2)
मतलब: अल्लाह के दोस्तों को न कोई डर है न कोई दु:ख
 
औलिया अरबी शब्द ’वली’ का बहुवचन है. ’वली’ यानि अल्लाह का दोस्त. यहाँ हमारे मन में एक प्रश्न उठता है कि अल्लाह जो एक प्राकाश और अमर है उसकी दोस्ती एक मिट्टि से बने और मिट जाने वाले इंसान से कैसे होसकती है?
इंसान से ईश्वर की इस दोस्ती के भेद को समझने के लिए, इस सम्पूर्ण संसार के प्राकृतिक ररचनाओं को पवित्र पुस्तक कुरान, हदीस (पैगंबर के वचन) और ऋषियों द्वारा दर्शाए गए मार्गों की रोशनी में संक्षिप्त रूप में पेश करते हैं.
कुरान के अनुसार:
1) अल्लाह के तारीफ़ है:
اللَّهُ نُورُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ
अल्लाहो नूर- उस समवाते वल अर्ध
(सूरा नूर - आयत 35)
मतलब: अल्लाह आकाश और पृथ्वी का नूर (प्रकाश) है
2) ब्रह्मांड के निर्माण से पहले अल्लाह के ईलावा कुछ नही था:
اللَّهُ ُالذی خلق السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ
अल्लाहो लज़ी खलक-समावती वल अर्ध....
(सूरा सजदा - आयत 4)
मतलब: अल्लाह ने खुद इस आकाश, पृथ्वी और जो कुछ भी उन दोनों के बीच में है, छह दिनों में बनाया
ईश्वर ने स्वयं की उपस्तिथि के लिए अपने प्रकाश (नूर) द्वारा इस ब्राह्माण को उजागर किया.
 
मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर की रचना:
 
इस ब्रह्मांड को बनाते समय अल्लाह ने सब से पहले मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) नाम का अपना एक आईना बनाया. इस सच्चाई को साबित करने के लिए पैगंबर मोहम्मद (सल्लाहो अलेह वसल्ल्म) कि एक हदीस है:
اَوَّلُ مَاخَلَقَ اللہُ ْنُوٌریِ وَکُل الخَلَآئقَ مِن نُوٌریِ
आव्वलु मा खलकल लाहू नूरी वा कुल-लुल खलाएका मिन नूरी...
(मदारिजुन-नबुवत - पुस्तक संख्या 1 – Page-7)
मतलब: सबसे पहले अल्लाह ने मेरा नूर बनाया है और मेरे नूर (प्रकाश) से अल्लाह ने सभी जीवात्माओं की रचना की

इस प्रकार, अल्लाह ने सबसे पहले मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) नामी नूर को बनाया और येह ब्रह्मांड उसी नुर से रोशन है. "मोहम्मद" (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) इसी "नूर" का नाम है किसी इंसान का नाम नही है. यह नुर अल्लाह की छवि है. इसीलिए नाम मोहम्मद के बाद सल-ललाहो अलैहे-व-सल्लम लिखा जाता है. "सल-ललाह" का मतलब है अल्लाह का दीदार या अल्लाह की छवि .

 
ब्रह्मांड का निर्माण:
 
हज़रत जाबिर (र) ने बताया के उन्होने खुद पैगंबर मोहम्मद से पूछा "ओह! अल्लाह के पैगंबर (अवतार) ! मेरे माता-पिता का जीवन आप पर कुर्बान.. आप मुझे बताईए के अल्लाह ने सब से पेहले क्या बनाया था? आप ने उत्तर दिया सब से पेहले अल्लाह ने तुम्हारे नबी के (पैगंबर मोहम्मद- सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर को पैदा किया. और अल्लाह की इच्छा अनुसार यह नूर क‌ई वर्षों तक नक्षत्र में घूम रहा था. उस समय न नर्क और स्वर्ग थे, न देवता और ना ही पृथ्वी और आकाश थे.

फिर जब अल्लाह ने ब्रह्मांड का निर्माण करना चाहा तो इसी नूर (प्रकाश) यानी मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर से पूरे ब्रह्मांड को बनाया. (जैसा के "दलायेल-ए-नबुवत - इमाम बहिकी" में लिखा है). कई प्रसिद्ध विद्वानों (उल्मओं) ने इस हदीस पर पूरा भरोसा जताया है.

उदाहरण के लिए, इमाम इब्न-ए-हजर मक्की ने अपनी किताब अफ़ज़लुल कुरा में, अल्लामा कासी ने अताब-ए-उल्मुसर्रत में, अल्लामा ज़रकानी ने शराह-ए-मवाहिब में और अल्लामा शेख अब्दुल हक मुहद्दिस देहलवी ने मदारिज-उल-नबुवत में इस हदीथ का उल्लेख किया है.

मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर की सुंदरता (विशेषता) से अल्लाह खुद मोहित हुआ और इसलिए इस सुंदरता को बढ़ाने के लिए अल्लाह ने स्वयं की तजल्ली (उपस्थिति) दिखा कर इस ब्रह्मांड के रूप में प्रकट हुआ. (ऊपर लिखी हदीस इस अवधारणा का सबूत है). इस प्रकार यह ब्रह्मांड, जानवर, पेड़, पहाड, नदियां, मनुष्य और जिन्न आदि मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर में मौजूद, खुदा की सारी खूबियां को दिखलाती है.

चूँकि मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर अल्लाह (ईश्वर) की ही छवि है... इसलिए खुदा की सारी खूबियां इस नूर में मौजूद है. संक्षेप में अगर कहा जाए तो पूरे ब्रह्मांड का निर्माण एक ही स्रोत से हुआ है, वह स्रोत है नूर या कहिये अल्लाह या कहिये मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर; इसलिए अल्लाह ब्रम्हांड की हर सृष्टि में छिपा है.

(उदाहरण: जैसे मिट्टी में बो‌ए जाने के बाद जब एक बीज धरती में विलीन होकर एक विकसित पेड़ के रूप में दिखाई देता है तब बीज नहीं दिखता सिर्फ़ पेड़ दिखाई देता है. लेकिन वास्तव में वह बीज ही तो है जो पेड़ के रुप में सामने होता है, इसी तरह अल्लाह उसके सारे कृतियों में छिपा हु‌आ है)

इस प्रकार यह स्पष्ट है संसार के हर एक जीव में अल्लाह मौजूद (उपस्थित) है. और तमाम जीवों से उसकी ईश्वरता ज़ाहिर हो रही है. जैसे एक पेड़ अल्लाह की रचना है, लेकिन उस्की शाखाएं, फूल आदि की सुंदरता वास्तव में अल्लाह के नूर की विशेषताओं को दर्शाती हैं.. इसी तरह जीवित इंसान में खुदा के नूर की उपस्तिथि ज़ाहिर हो रही है. और उसके चलने, सुनने और बोलने की योगयता में ख़ुदा की महत्वता ज़ाहिर हो रही है.

मालूम हुआ अल्लाह अपनी सारी कृतियों में छिपा हुआ है और मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर अल्लाह के गुणों के रूप में दुनिया में ज़ाहिर है. निष्कर्ष निकाला जासकता है कि जहां कहीं अल्लाह मौजूद है, मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर भी मौजूद है. यह स्पष्ट है कि जब से इस ब्रह्मांड का निर्माण हुआ है और जब तक यह ब्रह्मांड रहेगा, अल्लाह ब्रह्मांड की इन रचनाओं में बाहरी एवं आंतरिक रूप में मौजूद रहेंगे.
इस तरह अल्लाह (ईश्वर) सर्वप्रथम भी है और अंत में भी वही है; समस्त प्राणियों में आंतरिक रूप में भी वही है और स्वरुप में भी वही है.

कुरान ने इस अवधारणा को साबित किया है
هُوَ الاَوَّلُ وَالاٰخِرُ وَالظَّاهِرُ وَالبَاطِنُ ۚ وَهُوَ بِكُلِّ شَىءٍ عَلِيمٌ
हु-अव्वलो वल-आखिर हु-वल ज़ाहिर वल बातिन
(पारा - 27, आयत -3)
दूसरे शब्दों में
لَامَوٌجُودِ إلّآ اللہ
ला मौजुद ईल-लल-लाह
मतलब: अल्लाह के सिवा किसी का अस्तित्व नही है
 
वाहदहु-ला-शरिका-लहु - وحدہُ لاشریک لہ :
 
अल्लाह को छोड़कर अगर कोई मौजूद नहीं है, तो फिर एक सवाल उठता है कि येह सभी नज़र आने वाले कौन हैं?
दरासल येह सभी नज़र आने वाले प्राणि वास्तविक नही सिर्फ़ एक परछा‌ईं हैं. हर शरीर में अल्लाह का एक गुण (यानि आत्मा) सभी कार्यों के लिए जिम्मेदार होती है. और जब यह आत्मा शरीर से निकल जाती है, तब शरीर कोई काम का नहीं रहता. इस से साबित होता है कि शरीर आत्मा का वस्त्र है और आत्मा (अल्लाह की विशेषता या गुण) शरीर के अस्तित्व के लिए जिम्मेदार है.

दूसरे शब्दों में अल्लाह को छोड़कर किसी का अस्तित्व नहीं है. इसी सन्दर्भ में एक हदीस है:
"युग को बुरा मत कहो युग अल्लाह है"
قَالَ اللَّهُ عَزَّ وَجَلَّ يُؤْذِينِي ابْنُ آدَمَ، يَسُبُّ الدَّهْرَ وَأَنَا الدَّهْرُ، بِيَدِي الأَمْرُ، أُقَلِّبُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ
(हदीस बुखारी –Volume 2 - पेज - 913) - (अल-सहीह-बुखारी-शरीफ़ ४८२६ - किताब ६५ - हदीस ३४८)
आप (सल्लाहो अलेह वसल्ल्म) ने कहा, अल्लाह फ़रमाता है, आदम के वंशज मुझे दुख देते हैं जब वह युग को बुरा भला कहते हैं. जबके मैं ही युग हुं. मेरे हाथ मैं हर चीज है. मैं ही दिन और रात का चक्र चलाता हुं.

इस अवधारणा को तसव्वुफ़ (सूफी मत) में वह्दतुल-वुजूद कह्तें है. और जो इस रहस्य को समझ लिया के "अल्लाह के सिवा कोई मौजुद नहीं है" या "सभी प्राणि अल्लाह द्वारा निर्माण किये गये हैं", केवल वही सही मायने में एक ईश्वरवाद या "वाह-दहु ला शरिका लहू" को समझता है. खुद को शिर्क यानी बहुदेववाद से बचा लेता है और उपर लिखी कुरान की आयतों कि सच्चाई को समझ लेता है.
 
आदम अलैहिस्सलाम (मनु महाराज) की रचना:
 
शुरुआत में, आदम (अलैहिस्सलाम) की मूर्ति बनाते समय, अल्लाह ने मूर्ति में मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर रखा और फ़रिश्तों यानि देवताओं को इसी मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर को साष्टांग प्रणाम (सजदा) करने को कहा गया.

(मतलब आदम (अलैहिस्सलाम) की मूर्ति में अगर खुद खुदा मौजुद नहीं होता तो अल्लाह फ़रिश्तों को सजदा करने का आदेश नहीं देता). केवल मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर के कारण आदम (अलैहिस्सलाम) को अल्लाह की विशेषताओं का ज्ञान मिला और इसी लिए वह स्वर्गदूतों (फ़रिश्तों) का जवाब दे पाए और उन्हे न केवल स्वर्गदूतों की तुलना में बल्के (उस वक्त) ब्रह्मांड के सभी प्राणियों की तुलना में प्राथमिकता मिली. उन्हे सबसे अच्छा प्राणी (अशरफुल-मखलुक) और अल्लाह के खलीफा (उत्तराधिकारी) का खिताब मिला.

यह मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर आदम (अलैहिस्सलाम) से उन्के बेटे शीश (अलैहिस्सलाम) में आया और एक के बाद एक कई युगों से होते हुए यह हजरत अब्दुल्ला तक पहुंचा. हजरत अब्दुल्ला से पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) में समा गया. इसी सन्दर्भ में एक हदीस है:
بُعِثْتُ مِنْ خَيْرِ قُرُونِ بَنِي آدَمَ قَرْنًا فَقَرْنًا، حَتَّى كُنْتُ مِنَ الْقَرْنِ الَّذِي كُنْتُ فِيهِ
(हदीस बुखारी –Volume 2 - पेज - 325) से लिया गया
मतलब: अल्लाह ने मुझे एक के बाद एक हर युग में पैदा किया. फिर इस युग में पैदा हुआ
 
पवित्र पैगंबर का पुनर्जागरण:
 
पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) १९ अप्रैल ५७१ को इस दुनिया में अवतरित हुए. आदम के तरह आप जन्म से पैगंबर थे. इंसान के रूप में आपका नाम "सल्लम" था. दिव्य रूप में आपका नाम मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) है. आपकी मां का नाम बीबी आमिना था. ४० साल कि उमर में आप हिरा नाम की गुफा से मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के रूप में प्रकट हुए.
 
मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के व्यक्तित्व में खुदा (ईश्वर) की महानता का दर्शन है
 
मानवता की बेहतरी के लिए हुज़ुर सल्लम की चिंता और तड़प से आपका व्यक्तित्व इस कदर महान है जिसका कोई दूसरा उदाहरण नही हो सकता. जिसको समझना और समझाना भी मुश्किल है. जिस तरह एक कांच पर पारा चड़ा देने पर कांच एक दर्पण बन जाता है उसी तरह आप गार-ए-हिरा से निकलने के बाद दुनिया के सामने मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के रूप में प्रकाशित हुए.
 
 
आप (स.अ.व) का व्यक्तित्व (आत्मा) मोहम्मद (स.अ.व) का नूर ही है: हदीस से पुष्टि:
 
पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) ने ऊपर लिखित हदीस में स्पष्ट रुप से घोषित किया है कि सबसे पहले अल्लाह ने उनके नूर (प्रकाश) को बनाया है इस नूर से अल्लाह ने अन्य सभी प्राणियों को बनाया. इस से यह साबित हो जाता है कि पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) की आत्मा ही मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर है. पैगंबर मोहम्मद इतने महान हैं कि सिर्फ़ आप सिद्रतुल-मुन्ताहा (परम देवत्व) तक पहुंच सके. जहां कोई और पैगंबर यहां तक कि जिबरईल (अ स) भी नही पहुंच सके. यह बहुत स्पष्ट है कि, केवल मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर (जमाल-ए-अल्लाह) ही मकाम-ए-अल्लाह (परम देवत्व) तक पहुंच सकता है.
 
आप (स.अ.व) का व्यक्तित्व (आत्मा) मोहम्मद (स.अ.व) का नूर ही है: कुरान से पुष्टि:
 
अल्लाह कुरान में कह्ता है:
يَا أَهْلَ الْكِتَابِ قَدْ جَاءكُمْ رَسُولُنَا يُبَيِّنُ لَكُمْ كَثِيرًا مِّمَّا كُنتُمْ تُخْفُونَ مِنَ الْكِتَابِ وَيَعْفُو عَن كَثِيرٍ قَدْ جَاءكُم مِّنَ اللَّهِ نُورٌ وَكِتَابٌ مُّبِينٌ
कद-जा-अकुम मिन-अल्लाहि नूर व-किताबुन मुबीन
(सूरा अल-मायीद; Para – 6; verse_15)
मतलब: निश्चित रूप से एक नूर (आप सल्लाहो अलैह वसल्लम) आया और स्पष्ट पुस्तक (पवित्र कुरान)
इस आयत में अल्लाह ने पूरी तरह से स्पष्ट किया है कि पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का सम्पूर्ण आचरण दुनिया के सामने एक खुली किताब (पवित्र कुरान) है.. अल्लाह की इस घोषणा को पढ़ने के बाद भी अगर कोई पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के व्यक्तित्व को नूर के रूप में स्वीकार नहीं करता है, तो वह निश्चित ही भटका हुआ है.
وَمَآ اَرْسَلْنٰـکَ اِلَّا رَحْمَةً لِّلْعٰلَمِيْنَ
वमा अर-सलनाक अल्लहे रहमतुल लिल-आलमीन
(सूरा अम्बियाह Verse_107)
मतलब: और हमने तुम्हे भेजा सारे संसार के आशीर्वाद (रहमत) के लिए
ऊपर लिखी कुरान की आयत में अल्लाह ने पैगंबर मोहम्मद (शा) को सभी ब्रह्माण्डों के लि‌ए रहमत यानि आशीर्वाद कहा है. लेकिन एक मानव सभी ब्रह्माण्डों के लि‌ए आशीर्वाद कैसे हो सकता है. यह शीर्षक, अपने आप में सबूत है कि पैगंबर मोहम्मद (शा) का व्यक्तित्व नूर है. और इसिलिए आप शान-ए-लाहूती अर्थात सर्व-भूत हैं और हर चीज़ पर प्रभुत्व रखते हैं. दूसरे शब्दों में अल्लाह द्वारा यह सत्यापित किया जा रहा है कि पैगंबर मोहम्मद का व्यक्तित्व (आत्मा) नूर (प्रकाश) है.

यह बहुत स्पष्ट है, कि पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा का स्तर इतना ऊंचा है के आप कि आत्मा ही मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर बन गयी. दूसरे शब्दों में कहा जाये तो एक दर्पण छवि. इसी कारण आपको अल्लाह का प्रतिनिधि कहा जाता है. और इसि लिए आपके नाम के बाद सल-लल-लाहू-अलैहे-व-सल्लम लिखा जाता है. सल-लल-लाहू का मतलब है अल्लाह का नज़र आना.

क्योंकि दूसरे किसी भी नबियों में मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर की पूर्ण रूप से उपस्तिथि ज़ाहिर नही हुई थी जिस तरह से आप के व्यक्तित्व में ज़ाहिर हुई इस लिए अल्लाह ने आपको खातिमुल-नबीन (यानि अंतिम नबी) का शीर्षक दिया. आपको "सिराजुन-मुनीरा" अर्थात प्रबुद्ध सूर्य (परम ज्योत) भी कहा जाता है. यह सूर्य पूरे ब्रह्मांड को और मानव के दिलों को रोशन कर रहा है.

इसि संबंध में स्पष्टीकरण के लिए एक प्रसिद्ध घटना है।

पैगंबर मोहम्मद ने अपने निधन से पहले एक वसीयत कि थी के उनके पवित्र वस्त्र को ’करन’ नामी क्षेत्र के व्यक्ति हजरत अवैस करनी को दे दिया जाए. उसी वसीयत को पुरा करने के लिए, हजरत अली और हज़रत उमर करन क्षेत्र गए और हजरत अवैस करनी से मिले. पवित्र वस्त्र को देखकर हजरत ओवैस करनी रो पड़े और हजरत उमर से पूछा कि क्या आपने पैगंबर मोहम्मद को देखा है? अवैस करनी के इस प्रश्न का उच्च महत्व है. एक व्यक्ति जो अपने पूरे जीवन में कभी पैगंबर मोहम्मद से नही मिला था, वह यह प्रश्न पूछ रहा था वह भी उन लोगों से जो पैगंबर मोहम्मद के साथ जिवन गुज़ारे थे. इस सवाल पर हजरत उमर शांत रहे.

तुम मेरे मोहम्मद को देखा है? अवैस करनी के इस सवाल का मतलब था के "क्य तुम ने पैगंबर मोहम्मद की पवित्र और महान आत्मा को (ना के केवल उन्के शरीर को) देखा है?". अवैस करनी के यह प्रश्न ऊपर उल्लेख किये गये अवधारणा का सबूत है.
 
पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व) सर्वव्यापी हैं
 
क्यूंकि मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर यानि अल्लाह कि छवि या जमाल-ए-अल्लाह, सर्व-भूती और अजर अमर (हयूल-कय्यूम) है और चूंकि पैगंबर मोहम्मद का व्यक्तित्व इसी अल्लाह कि छवि से बना है इसलि‌ए पैगंबर मोहम्मद भी अनन्त और सर्व-भूती हैं. मतलब, यह भी हयूल-कय्यूम हैं. और यही हयातुन-नबी (सिर्र-ए-मोहम्मदी) का रहस्य है. हालांकि पवित्र नबी का शरीर अदृश्य है, लेकिन सूफि-सन्त, औलिया-ए-करम जो दिव्य दृष्टि रखते हैं इस रहस्य से अच्छी तरह परिचित हैं और इसी कारण से उनका मानना है कि पैगंबर मोहम्मद सर्वव्यापी हैं, और इसि लिए वे पैगंबर मोहम्मद को "सल-लल-लाह" कहते हैं. "सल-लल-लाह" यानि अल्लाह का दर्शन.

अल्लाह ने खुद पैगंबर की आध्यात्मिक बुलंदी कि प्रशंसा की है और कुरान में कहा है:
اِنَّ اللّٰهَ وَ مَلٰٓىٕكَتَهٗ یُصَلُّوْنَ عَلَى النَّبِیِّ
इन्नल्लाहा मलाय-ए-कतहु यसल-लूनल-नबि
(सूरा अहज़ाब - पारा 22 - अनुच्छेद 56)
मतलब: अल्लाह और उसके मलायक (देवी-देवता) पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व) पर सलात और सलाम भेजते हैं, इसलि‌ए अए मानने वालों! तुम भी पैगंबर मोहम्मद पर सलात और सलाम भेजो

कुरान की इस आयत से पता चलता है कि पैगंबर मोहम्मद ऐसी सर्वश्रेठ प्रशंसा योग्य व्यक्तित्व रखते हैं कि अल्लाह अपने सभी स्वर्गदूतों के साथ पैगंबर मोहम्मद कि प्रशंसा करता है और सलात और सलाम भेजता है. चूंकि उनका व्यक्तित्व एक नूर (मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर) है, जो अनन्त दुनिया यानी आलम-ए-लाहूत से विकसित हुआ है, इसलि‌ए वह लाहूती-शान (दिव्य शक्ति) रखते हैं. इसलि‌ए वह हर चीज़ पर हुकुमत रखते हैं.

लेकिन पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) ने इस दुनिया में एक व्यक्ति (इंसान या आदम) के रुप में जन्म लिया है इसलिए आप मानव राजसीयत (शान-ए-नासूती) भी रखते हैं. अंत में पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) मानव राजसीयत (शान-ए-नासूती) भी रखते हैं और दिव्य शक्ति से भी मालामाल हैं.

संक्षिप्त में, दिव्यता के दायरे (आलम-ए-लाहूत) में, पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) अहद हैं, और इस दुनिया (आलम-ए-नासूत) के दायरे में, अहमद (सर्वश्रेठ प्रशंसा योगिये) हैं.
इस बात से को‍ई भी समझ सकता है के महामहिम पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) केवल मानव ही नहीं नूर भी हैं। यही कारण है कि पैगंबर मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का साया नही दिखा. क्या मानव मस्तिष्क या विज्ञान इस रहस्य की व्याख्या कर सकते कि चार अलग-अलग तत्वों (मिट्टी, जल, अग्नि और वायु) से बना एक शरीर का साया नही हो सकता?
एक और सवाल: आपका पसीना खुशबू की तरह महकता था. क्या को‍ई बता पाएगा के कैसे एक मानव शरीर से इस तरह कि सुगंध आ सकती है?
इसी तरह कोई कीट उनकी पवित्र शरीर को छू भी नही सका. क्या कोई विद्वान इसका जवाब दे सकता है?
इस में कोई दो राय नही के पैगंबर मोहम्मद का व्यक्तित्व अल्लाह का पहला परदा है. इसलिए महामहिम पैगंबर मोहम्मद की आत्मा पूर्णता नूर है. जिस तरह से तलवार और उसकी धार को अलग ढंग से चित्रित किया जाता है, लेकिन वास्तव में धार भी उसी तलवार का एक हिस्सा है. ठीक उसी प्रकार से पैगंबर मोहम्मद का व्यक्तित्व (आत्मा) जो मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर है अल्लाह से अलग नहीं है.

इसी कारण अल्लाह ने पवित्र कुरान में घोषित किया है कि:
पैगंबर मोहम्मद के प्रति निष्ठा (अतात-ए-रसूल) को अल्लाह ने अपने प्रति निष्ठा कहा है (सूरा निसा आयत-८०)
पैगंबर मोहम्मद के कार्यों को अल्लाह का कार्य कहा है.(सूरा अल-अनफाल-आयत -१७)
पैगंबर मोहम्मद की दीक्षा (बय्यत) को अल्लाह की दीक्षा कहा है (सूरा अल-फतह आयत -१०)
इन्सान, एक प्रबुद्ध व्यक्तित्व को जिसके प्रति अल्लाह स्वयं भावुक और प्रशांसक है कैसे समझ सकता है. यही कह सकते हैं:
आंख वाला तेरे जोबन का तमशा देखे : दीदाय-ए-कोर को क्या आये नज़र क्या देखे
(अर्थ: जैसे केवल प्रकाश की उपस्थिति में ही हम चीजों को देख सकते हैं, इसी तरह एक मनुष्य जिसके आत्मा प्रकाशित हो वही पैगंबर मोहम्मद के दैवीय प्रबुद्ध व्यक्तित्व को देख और समझ सकता है. यह आत्मज्ञान के बगैर समझना मुश्किल है)
 
उच्चतम विनम्रता (अदा-ए-मारफ़ना):
 
चूँकि सारे संसार की सुंदरता मुहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के प्रकाश से निर्मित है और यही प्रकाश आपका स्वरुप है इस लिए सारे संसार का ज्ञान आप में समाया है. चूँकि आपका प्रकाश अनंत है इस लिए आप किसी भी तरह के कार्य के लि‌ए सक्षम हैं.

प्रणाम आपकी महानता को, आप इतने उच्च स्थान पर और सर्वशक्तिमान होते हुए भी अपने आपको छुपाते हुए लोगों में खुद को लोगों के जैसा एक मनुष्य कहा. और जो लोग उनकी शान-ए-लाहुती (दिव्य शक्ति) से अनजान हैं वह आप की महानता को नहीं समझ सके. ऐसे लोग कुरान की यह ला‌ईन पड़तें हैं तो भी यह कहते हैं के आप हमारी तरह एक मनुष्य हैं.
قُلْ إِنَّمَآأَنَا بَشَرٌ مِّثْلُكُمْ يُوحَىٰٓ إِلَىَّ أَنَّمَآ إِلَٰهُكُمْ إِلَٰهٌ وَٰحِدٌ ۖ
कुल इन-नमा अना बशरुन मिस्लुकुम युहा इल्लाह्या
(सूरा कहफ़ वोल १६ वर्स ११)
मतलब: मैं आप जैसे इंसान हूं, लेकिन मुझ पर ईश्वरावेश (आकाशवाणीयां) उतरती है


निश्चित रूप से आप ने इस धरती पर एक मनुष्य के रूप में जन्म लिए और दुखों और कठिन स्थितियों का भी सामना किये. मानव जाति के मार्गदर्शन करने के लिए यह जरूरी भी था. क्युंकि किसी भी समाज का उद्धार करने के लिये मार्गदर्शक को उसी रूप का होना ज़रुरी होता है इसलि‌ए आप को इंसान के रूप में उपस्थित होना पड़ा

लेकिन उनका व्यक्तित्व वास्तव में मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर ही है, जैसा उपर के भाग में साबित किया गया है. दुर्भाग्य से उल्मा (इस्लाम की जानकारी रखने वाले विद्वान) उपर लिखित कुरान के उसी श्लोक के बाद के हिस्से पर ध्यान नहीं देते जिस्में कहा गया है कि "मुझ पर ईश्वरावेश (आकाशवाणीयां) उतरती है" जो आप को दूसरे मनुष्य से महान बनाता है. संक्षिप्त में कहें तो पैगंबर मोहम्मद का व्यक्तित्व मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर है इसिलिए वह शान-ए-लाहुती (दिव्य शक्ति) रखते हैं, और इस ब्रह्मांड की हर दिखा‌ई देने वाली और अदृश्य चीज़ों की जानकारी रखते हैं, और आप पर ईश्वरावेश (आकाशवाणीयां) उतरती हैं.

क्या हम में इस तरह के गुण हैं?
निश्चित रूप से, इस प्रश्न का उत्तर होगा ”नहीं". क्योंकि अल्लाह के सभी दूतों (पैगंबरों) का रुत्बा आम इंसानों से बडा और उपर होता है. और पैगंबर मोहम्मद की शान और रुत्बा तो सभी पैगंबरों से भी उंचा है (अफ़ज़ल-उल-अंबिया). इसलि‌ए पैगंबर मोहम्मद के साथ किसी भी आम आदमी की तुलना का सवाल ही नहीं है.

इसी सन्दर्भ में एक और विशिष्ट बिंदु यह भी है कि सारे इंसानों की आत्माएं सिर्फ अल्लाह का एक गुण (अम्र-ए-रबी) है. लेकिन पैगंबर मोहम्मद की आत्मा सब से अलग यानी यह पूर्णतः रूप से खुदा (ईश्वर) का ही नूर है.
 
परम ज्योत (सिराजुन मुनिरा):
 
चूंकि नबी मोहम्मद का व्यक्तित्व मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर से प्रबुद्ध (रोशन) है, महामहिम पैगंबर मोहम्मद कि आत्मा सूर्य की तरह चमकदार है. और जिस तरह सूर्य अंधकार को नष्ट करके पूरे ब्रह्मांड में रोशनी फैलाता है, इसी तरह पैगंबर की नूरानी आत्मा दिल और आत्मा के अंधेरे को दूर करती है और उन्हें प्रकाशित करती है, और इस प्रकार पूरी मानवता; प्रकाश (नूर) से जगमगा रही है.

पैगंबर मोहम्मद ने हजरत अली को इस नूर से विभूषित होने का योग्य पाया इस लिए सब पहले हज़रत अली को यह नूर दिया गया और उनके ह्रिदय को प्रकाशित किया गया. इस संदर्भ में कई हदीस हैं. जैसे कि:
اَنَا مدِینَۃُ العِلمِ وَعَلِیّ بَابُھَا
अना मदीनतल-इलम व अली बाबहा
मतलब: मैं ज्ञान का शहर हूँ और अली उसके द्वार
 
مَنْ کُنْتُ مَوْلاهُ، فَهَذَآ ٌعَلِىٌّ مَوْلاهُ
मन कुनतो मौला फ़-अली मौला
मतलब: मैं जिसका मौला अली भी उसके मौला हैं

दिलों को रोशन करने का यह कार्य सिलसिलावार हो रहा है. महामहिम पैगंबर मोहम्मद से हजरत अली, हजरत अली से औलिया-ए-कराम (ऋषि मुनियों - सुफ़ी सन्त) चाहने वालों के दिलों को रोशन कर रहें हैं. रहती दुनिया तक यह प्रक्रिया जारी रहेगी. इसलि‌ए महामहिम पैगंबर मोहम्मद के बाद अब अल्लाह के किसी भी दूत (नबी) की कोई जरूरत नहीं है.
 
विलायत:
 
पवित्र कुरान में अल्लाह ने कहा:
قَدْ أَفْلَحَ مَنْ تَزَكَّى
कद-फ़लाह मन-तज़क्का
(सूरा अल-आला: पारा ३०; वर्स १४)
मतलब: बेशक वह अपने लक्ष्य तक पहुंचा है जो (दिल) साफ़ हुआ
दिल की सफा‌ई का मतलब है अहंकार जैसे क्रोध, लोभ, ईर्ष्या द्वेष, अभिमान आदि से छुटकारा पाना. किसी प्रबुद्ध व्यक्ति (सन्त या गुरु) की शरण में रहने से इन अवगुणों का त्याग किया जा सकता है. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लि‌ए एक साधक को किसी उत्तम ऋषि या गुरु की शरण में जाना चाहिए और उसे एक आज्ञाकारी शिष्य होना चहिए.
 
अल्लाह में विलय और अल्लाह के साथ अमर होजाना (फ़ना-फ़िल्लाह और बका-बिल्लाह):
 
जब एक साधक अपनी प्रार्थना और प्रयासों के आधार पर अपने दिल की सफा‌ई करने में सफल हो जाता है, तब वह जान लेता है कि नफ्स (अहंकार) का ना कोइ मूल्य है और ना ही उसका वास्तविकता से कोई लेना देना है. दूसरे शब्दों में, साधक अपने अहंकार को इस हद तक काबु में कर लेता है जैसे उसने मौत प्राप्त कर ली हो और इसलि‌ए इसे मौत से पहले मौत को प्राप्त करना (फ़ना-फ़िल्लाह) भी कह्ते हैं. ऐसे किसी साधक में जब उनके मुर्शीद (गुरु) मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर रख देते हैं, तब उनकी आत्मा भी प्रज्वलित हो जाती है. चूंकि मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर सर्वशक्तिमान (हैयुल-कय्यूम) है, इस्लिए इस नूर के साथ प्रज्वलित आत्मा भी सर्वशक्तिमान और अमर हो जाती है. इसे बका-बिल्लाह या अल्लाह (यानि नूर) द्वारा जीवन का अस्तित्व कहा जाता है. पवित्र कुरान में इस उपलब्धि यानी अनन्त अस्तित्व या अमरता को "फ़्लाह" यानि जीवन में सफलता प्राप्त करना बताया गया है.

एक आत्मा जो मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर से प्रज्वलित हुई हो अल्लाह के गुण को समोए रखती है. और इसलि‌ए एक व्यक्तित्व जो अल्लाह के गुणों के साथ सजा हो अपने शरीर से मुक्त हो कर पूरे ब्रह्मांड पर राज करता है. ऐसे व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य के लिए अपने शरीर के अंगों और इंद्रियों पर निर्भर नहीं रहते, क्योंकि उनका हर कार्य नूर द्वारा किया जाता है.
فَإِذَا أَحْبَبْتُهُ، كُنْتُ سَمْعَهُ الَّذِي يَسْمَعُ بِهِ، وَبَصَرَهُ الَّذِي يُبْصِرُ بِهِ، وَيَدَهُ الَّتِي يَبْطِشُ بِهَا، وَرِجْلَهُ الَّتِي يَمْشِي
इज़ा अहब-बतु कुन्तो समाउ...
(मिशकात-ए-हक़्कानिया Page 197) - हदीस २५ - "४० हदीस-ए-क़ुदसी"
मतलब जब मेरा बँदा (प्राणी) अपने अच्छे कर्मों, प्रार्थना और प्रयासों से मेरे करीब पहुंचता है, तब मैं खुद (अल्लाह या नूर) उस्की आंख या दृष्टि बन जाता हुं, जिस से वोह करीब और दूर कि चिज़ों को देखता है. मैं खुद (अल्लाह या नूर) उसका कान हो जाता हुं जिसके माध्यम से वह सुनता है. मैं खुद (अल्लाह या नूर) उसके हाथ और पैर बन जाता हुं. संक्षिप्त में कहें तो एक बाँदा अल्लाह जैसा मुकाम पा लेता है. मत्लब जैसे अल्लाह पूरे ब्रह्मांड को देख सकता है उसी तरह बँदा (प्राणी) कमरे के एक कोने में बैठे पूरी दुनिया देख सकता है.

इस से संबंधित एक हदीस है।
الْمُؤْمِنِ فَإِنَّهُ يَنْظُرُ بِنُورِ اللَّهِ
अल मोमिनु यनज़ैरु बिनुरिल्लाह
तर्मिज़ी हदीस क्रमांक: ३४
मतलब: मोमिन अल्लाह के नूर से देखता है
अंत में, एक साधक की आत्मा के मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर (जमाल-ए-अल्लाह) के साथ प्रज्वलित होने को "अल्लाह की दोस्ती" या विलायत कहते हैं और जो मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर को प्राप्त कर लेता है उसे "वली" यानि "अल्लाह का दोस्त" कहते हैं.

इसी कारण से एक "आरिफ" (जो आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया हो) अपने दिल में पूरी दुनिया को देखता है. इसी संबंध में अली मौला की एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक घटना है. अली मौला, जंग-ए-खंदक (खंदक के युद्ध) में दुशमन फ़ौज के सरदार अम्र-बिन-अब्दल वुद के सामने थे. जब मौला अली ने उसे पछाड़ कर उसका भाला छिन लिया और बजाय अम्र को मारने के भाले को हवा में एक तरफ़ फेंक दिया. तो अम्र चिल्ला उठा और उसने कहा: "या अली! जब भाला ले लिया था तो मुझे मार देते, उसे हवा में क्युं फेंक दिया?". याद रहे कि, वो भाला, अम्र का पुश्तैनी भाला था, भाला उसके लिए किसी पदक जैसा था. अम्र को उस भाले से बहुत लगाव था.
अम्र कि दिल में उठ रहे सवालों और बेचैनी को देख कर अली मौला को सच बताना पड़ा. आप ने कहा: "जिस समय मैने वह भाला उठाया, उसी समय मुझे एक मछली ने पुकारा जिसे एक मगरमच्छ खाने जा रहा था. 'या अली मदद!'. और बस उसकी मदद के लिए मैंने वो भाला उस मगरमच्छ की तरफ़ फेंक कर उस मछली कि मदद की".

अली मौला का युद्ध के बीच यह दिव्य कार्य बताता है कि आप को कितनी दिव्य शक्तियां प्राप्त थीं. यहाँ कुछ सवाल मन में आते हैं, अली मौला कैसे एक मछली की अवाज़ सुन सकते हैं? और जब के मदीने से समुंद्र इतनी दुर है. कौनसी ऐसी ताकत थी जिसने उस अवाज़ को समुंद्र से अली मौला तक पोंह्चा दिया?

यहां अली मौला की भूमिका अहम है, उन्होंने दुश्मन से लड़ते हुए एक गरीब मछली की मदद की. उनके इस कार्य से पता चलता है कि निश्चित रूप से कोई शक्ति है जो ऐसी अद्भुत क्षमता के लिए जिम्मेदार है. वास्तव में यह मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर ही है, नूर (अल्लाह) के बिना कोई असंभव बात कैसे संभव बन सकती है? यह नूर ही है. जब यह अल्लाह के पैगंबर द्वारा प्रकट किया गया तब यह मोजिज़ा कहलाया और जब यह औलिया-ए-कराम द्वारा प्रकट हुआ यह "करामत" कहलाया. और अल्लाह के विभिन वलियों (दोस्तों) द्वारा ऐसी अनेक उल्लेखनीय घटनायें दर्शायी गयी हैं. यह बात ध्यान देने योग्य है कि जब एक वली (अल्लाह के दोस्त) ऐसे गून रख सकता है तो पैगंबर मोहम्मद के व्यक्तित्व की महिमा क्या होगी जो पूर्णता मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर ही है.

 
औलिया-ए-कराम (अल्लाह के दोस्तों) कि अप्रत्यक्ष अवस्था:
 
औलिया-ए-कराम (अल्लाह के दोस्तों) के संबंध में पैगंबर मोहम्मद ने उल्लेख किया है
اِنَّ اَوُلِیَآ ئِیٌ تَحُتَ قَبَآئِیٌ لاَ یَعٌرِ فُھُم غَیِرِیٌ۔
इन्ना औलिया तहत-किबाली ला यरिफ़ुहुम ग़ैरी
(हवाला: असरार-ए-हकिकी, ख्वाजा मो‌इनुद्दीन चिश्ती अजमेरी ग़रीब नवाज़)
मतलब: मेरे औलिया (मित्र) मेरी अबा (पोशाक) में हैं. कोई उन्हे नही समझ सकता, सिर्फ़ मैं उन्के गौरव को जानता हूं.

यह सभी अल्लाह के वली (सन्त व मुनि) सांसारिक जीवन में इंसान के रूप में नज़र आते हैं. लेकिन यह सच है कि, उनका व्यक्तित्व मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर का एक प्रतिरूप है. उनकी आत्मा मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर में समाविष्ट (घुली मिली) है. इस्लिए उनके द्वारा किए गए चमत्कार की अभिव्यक्ति नूर की वजह से है. दुर्भाग्य से हमारी आँखें औलिया-ए-कराम में मौजुद इस मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर को देखने से असमर्थ हैं, लेकिन जिस तरह एक लाईट बल्ब के रोशन होने से और पंखे के घुमने से हमें तार में मौजुद बिज्ली का पता चल जाता है उसी तरह अल्लाह के प्यारे औलिया-ए-कराम द्वारा चमत्कार की प्रदर्शनी से हमें उनमें मौजुद मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर का पता चल जाता है. इसलि‌ए वली अल्लाह (ऋषि – गुरु) के पास जाना, प्रार्थना करना और जीवन की कठनायों के लिये मदद मांगना वास्तव में, मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर यानि अल्लाह से सहायता प्राप्त करना ही है. यह पूरी तरह से सही है और इसमें शिर्क यानि बहुदेववाद का सवाल ही नहीं है.
 
मज़ारों और दर्गाहों पर जाना:
 
जैसा कि विलायत के अनुच्छेद में बताया गया है, हर वली की आत्मा मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर में समाविष्ट (घुली मिली) होती है इसीलिए मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर की सभी विशेषताएं उनके अन्दर मौजूद होती है और नूर की तरह यह भी अमर और सर्वशक्तिमान बन जाते हैं. इस्लिए इनके निधन के बाद भी मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर कि वजह से इनकी मज़ारों से मानवता की भलाई के काम होते रहते हैं. इसी वजह से दर्गाहों और मज़ारों पे प्रार्थना या अनुरोध करना सही मायने में खुद अल्लाह या मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर से प्रार्थना या अनुरोध करना है. जो लोग इस वास्तविक तथ्य से अनजान हैं वह इसे विधर्मता (बिद्दत) या बहुदेववाद (शिर्क) कहते हैं. और जो लोग मज़ारों पर आते हैं वह भी इस वास्तविक्ता् से अंजान होते हैं. इस्लिए हर एक को अध्यन करना चाहिए और ज्ञान लेना चाहिए.

इस ब्रह्मांड के निर्माण के समय अल्लाह ने स्वर्गदूतों (फ़रिशतों) से मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर को साष्टांग प्रणाम करने को कहा था जो आदम (अलेह सलाम) के भीतर छिपा हु‌आ था. यही नुर जब पैगंबर मोहम्मद कि आत्मा बन गया अल्लाह ने कहा
اِنَّ اللّٰهَ وَ مَلٰٓىٕكَتَهٗ یُصَلُّوْنَ عَلَى النَّبِیِّ
इन्नल्लाहा मलाय-ए-कतहु यसल-लूनल-नबि
(सूरा अहज़ाब - पारा 22 - अनुच्छेद 56)
मतलब: अल्लाह और उसके मलायक (देवी-देवता) पैगंबर मोहम्मद (शा) पर सलात और सलाम भेजते हैं, इसलि‌ए अए मानने वालों! तुम भी पैगंबर मोहम्मद पर सलात और सलाम भेजो
और मानने वालों को भी पैगंबर मोहम्मद पर सलाम और सलात पेशकश करने का आदेश दिया. यह पूरा सम्मान, प्रार्थना आदि मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर (अल्लाह के जमाल) के लि‌ए ही है.

जैसा कि उपर लिखा गया है कि यह मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर, पैगंबर मोहम्मद से हज़रत अली को मिला और हज़रत अली से विभिन्न औलिया-ए-करम (सुफ़ी / सन्त) तक पहुंचा. इस्लिए सुफ़ी सन्तों के पर्दे में मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) का नूर ही जगमगा रहा है. जिस तरह क़ाबे कि दिशा में सजदा करने से सजदा सीधे अल्लाह तक पहुंचता है. ठीक उसी प्रकार सुफ़ी सन्त काबे कि तरह एक पर्दा है, इस्लिए उनको सजदा करना उनके दिल में मौजूद मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर (यानि अल्लाह) को सज्दा करना है.

अंत में यही कहा जा सक़्ता है कि मज़ारों पर जाना प्रार्थना करना वास्तव में मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर से प्रार्थना करना है. इस्लिए इस में विधर्मता (बिद्दत) या बहुदेववाद (शिर्क) का कोई सवाल ही नही है. यह सच है और हर एक को ठीक से समझ लेना चाहि‌ए.

हमारे सामने सुफ़ी सन्त इंसान के रूप में रहते हैं. लेकिन आध्यात्मिक रूप में वे मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर (प्रकाश) होते हैं. सुफ़ी सन्त दिखने में दास नज़र आते हैं लेकिन आंतरिक रूप से वह बहूत महान होते हैं और दुनिया पर राज करते हैं. ऊनकी आत्मा मोहम्मद (सल्लल-लाहो-अलेह-वसल्लम) के नूर में समोई होती है. ऊन्के द्वारा किए गए मानव जाति की भलाई के काम नूर-ए-मोहम्मद की वजह से ही होते हैं. लेकिन अफसोस! हमारी बेकार आंखें औलिया-ए-कराम (अल्लाह के मित्र सुफ़ी सन्त) में छूपे नूर को नहीं पह्चान सकती. उदाहरण: जिस तरह से हम बिज्ली के बल्ब और पंखे में मौजूद करंट को नहीं देख सकते लेकिन बल्ब कि रोशनी और पंखे के घूमने से बिज्ली के करंट के बहाव का अंदाज़ा लगा सकते हैं. उसी तरह से सुफ़ी सन्तों के द्वारा किए गए मानवता की भलाई के काम से उनके दिल में मौजूद नूर-ए-मोहम्मद को जाना सकता है. इस्लिए मज़ारों पर जाना प्रार्थना करना बिल्कुल ठीक है इस में कोई संदेह या झिझक नहीं होना चाहिए.

ध्यान दें:
इंसान को अल्लाह कि जान-पहचान (मारफ़त-ए-हक़) होना आवश्यक है, इसे ’अल्लाह (पर्मेश्वर) की निकटता’ (यानि कुर्ब-ए-इलाही) कह्ते हैं. यही इंसान के जीवन का उद्देश्य है. आध्यात्मिक गुरु के बिना (मुर्शीद) पर्मेश्वर से निकटता प्राप्त करना बहूत मुश्किल है. यह भी बहुत दुखः की बात है की आजकल सच्चा आध्यात्मिक गुरु मिलना मुश्किल है. क्यूंकि ऐसे लोग भी जिन्को अल्लाह कि जान-पहचान (मारफ़त-ए-हक़) नहीं है वह भी अपना तख्त सजा के बैठे हैं. इस्लिए अपने गुरु को जान और परख लेना चहिए. क्यूंकि एक उत्तम गुरु अपने शिष्ये को उसकि मंज़िल तक आसानी से पंहुचा सकता है. इस्लिए ऐसे नौसिखिये गुरुवों से सावधान रहना चहिए.